अब शायद यूपी के चुनावों मेंb बचा हैं,लेकिन राजनैतिक पार्टियों की ओर से तैयारियां शुरू कर दी गई हैं।जहाँ सरकार अपने आप को जनता की हितैषी वाली सरकार बताएंगी।वहीं विपक्ष सरकार की नाकामियों को उजागर करने के लिए फिर एक बार उसी रीत पर चलेगा जिस पर अभी तक विपक्ष चला आ रहा है।चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा है और साथ ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उत्सव।जिसको भुनाने में सरकार से लेकर जनप्रतिनिधि तक लगे हुए हैं।चुनाव! नारों, वादों का,विकास का, धैर्य का,लेकिन किसके सिर्फ जनता के,लगता तो कुछ ऐसा ही है।क्योंकि पिछले 70 सालों से जनता जर्नादन बनी हुई है।शायद इस बार भी जनता नेताओं के लिए किस्मत लिखने वाली स्याही की तरह काम करेगी।इसी के तहत अलग-अलग पार्टियां वोटरों को रिझाने के लिए नए-नए तरीके स्थापित करेंगें। माना जा रहा हैं कि यूपी में इस बार के चुनावों में ब्राह्मण वोटर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।यह पहले से जगजाहिर भी हैं कि यहाँ की राजनीति जातिवादी को बढ़ावा देती है।धीरे-धीरे यहाँ की राजनीति के केंद्र बिंदु में जातिबाद लगातार हावी होता जा रहा है,तो वहीं इसके प्रभाव भी निरंतर देखने को मिल रहे हैं।इसका ताजा उदाहरण हैं हाल ही में बसपा द्वारा किया गया ब्राह्मण सम्मेलन। जबसे पार्टियों को यह पता चला है कि ब्राह्मण वोटर जीत की भूमिका में रह सकता हैं, तभी से पार्टियों ने अपने-अपने स्तर पर ब्राह्मण सम्मेलन की योजना बनाई है।सवाल यह नहीं है पार्टियों को अपने -अपने वोटर रिझाने की आजादी हैं, सवाल हैं कि हम चुनावों के माध्यम से एक ऐसी अप्रत्यक्ष व्यवस्था खड़ा कर रहें हैं जिसमें मुद्दे से ज्यादा जातिवादी व्यवस्था पर जोर होगा।